19 जनवरी 1597 : मेवाड़ के सूरज ढल गए, लेकिन इज्जत आज भी जिंदा है
वीर महाराणा प्रताप जी , जयंती

19 जनवरी 1597 भारतीय इतिहास का वह दिन है, जब मेवाड़ के महान वीर महाराणा प्रताप जी इस दुनिया से चले गए, लेकिन उनका साहस, स्वाभिमान और देशभक्ति आज भी हर हिंदुस्तानी के दिल में जिंदा है। महाराणा प्रताप जी सिर्फ मेवाड़ के राजा नहीं थे, बल्कि वे उस सोच के प्रतीक थे, जिसने यह सिखाया कि चाहे कितनी भी गरीबी आ जाए, जंगलों में रहना पड़े, घास की रोटी खानी पड़े, लेकिन पराधीनता कभी मंजूर नहीं।

महाराणा प्रताप जी ने मुग़ल बादशाह अकबर के आगे कभी सिर नहीं झुकाया। अकबर की तरफ से कई बार समझौते का प्रस्ताव आया, लेकिन महाराणा प्रताप जी ने हर बार साफ मना कर दिया और आजीवन संघर्ष का रास्ता चुना।

1576 में हल्दीघाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप जी ने कम संसाधनों के बावजूद मुग़ल फौज को कड़ी टक्कर दी। इस युद्ध में उनके घोड़े चेतक ने अपनी जान देकर अपने स्वामी की रक्षा की। चेतक की वफादारी और महाराणा प्रताप जी की बहादुरी आज भी लोगों को गर्व से भर देती है।

हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप जी ने अपने परिवार के साथ जंगलों और पहाड़ों में बहुत ही कठिन जीवन बिताया, लेकिन कभी भी दुश्मनों के आगे घुटने नहीं टेके। उनकी रानी अजबदे और बेटे अमर सिंह ने भी मुश्किलें झेलीं, फिर भी मेवाड़ की आन-बान-शान को बचाए रखा।

महाराणा प्रताप जी का जीवन आज भी यह संदेश देता है कि देश और इज्जत सबसे ऊपर होती है। उनकी पुण्यतिथि पर आज जगह-जगह उन्हें याद किया जा रहा है और श्रद्धांजलि दी जा रही है।
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी को उनकी पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन।




